विसाल-ए-नबी ﷺ और सहाबा का सब्र
रसूलुल्लाह ﷺ का विसाल उम्मत की तारीख़ का सबसे बड़ा इम्तिहान था। सहाबा कराम, जिन्होंने अपनी जान से ज़्यादा नबी ﷺ से मोहब्बत की, अचानक उनके बिछड़ जाने का सदमा बर्दाश्त न कर पा रहे थे।
सहाबा का ग़म
हज़रत उमर रज़ि. सदमे में तलवार खींचकर बोले:
"जो कहेगा कि रसूलुल्लाह ﷺ का इंतिक़ाल हुआ है, मैं उसकी गर्दन उड़ा दूँगा।
आप अपने रब से मिलने गए हैं और लौटकर आएँगे।"
यह उनकी मोहब्बत थी, जिसने उन्हें हक़ीक़त से रोक रखा था।
मदीना की गलियों में रोने की आवाज़ गूंज रही थी। हर दिल पर ग़म का बोझ था।
अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ि. की हिम्मत
हज़रत अबू बक्र रज़ि. सीधे हुज़ूर ﷺ के कमरे में गए, आपके मुबारक चेहरे से चादर हटाई, माथे को चूमा और कहा:
"मेरे माँ-बाप आप पर क़ुर्बान,
आप ज़िंदगी में भी पाक थे और मौत के बाद भी पाक हैं।"
फिर मस्जिद में आकर लोगों से कहा:
"ए लोगो! जो मुहम्मद ﷺ की इबादत करता था, वो जान ले कि मुहम्मद ﷺ का इंतिक़ाल हो चुका है। और जो अल्लाह की इबादत करता है, तो अल्लाह हमेशा ज़िंदा है, कभी नहीं मरेगा।"
उसके बाद आपने कुरआन की ये आयत पढ़ी:
> "वमा मुहम्मदुन इल्ला रसूल, क़द ख़लत मिन क़बलिहिर-रुसुल। अफ़-इं मता औ क़ुतिला इं-क़लब्तुम अला आ'क़ाबिकुम?"
(आले इमरान: 144)
सब्र और उम्मत की ज़िम्मेदारी
सहाबा ने समझा कि मोहब्बत सिर्फ़ ग़म मनाने में नहीं, बल्कि नबी ﷺ की तालीमात को ज़िंदा रखने में है।
उन्होंने उम्मत को बिखरने से बचाया।
क़ुरआन और सुन्नत को फैलाया।
उम्मत की रहनुमाई की ज़िम्मेदारी उठाई।
यानी सहाबा ने हमें सिखाया कि सबसे बड़ा सब्र यह है कि मोहब्बत को अमल में बदला जाए।
सहाबा कहते हैं कि ऐसा लगा जैसे ये आयत अभी ही नाज़िल हुई हो। हक़ीक़त दिलों में उतर गई और सब्र आ गया।
ख़िलाफ़त-ए-राशिदा और इस्लाम का फैलाव
रसूलुल्लाह ﷺ के विसाल के बाद उम्मत के सामने सबसे पहला सवाल यह था कि अब उम्मत की रहनुमाई कौन करेगा? नबी ﷺ के बाद कोई नबी तो आने वाला नहीं था, इसलिए उम्मत को एक ऐसे अमीर की ज़रूरत थी जो नबी ﷺ के बाद क़ुरआन और सुन्नत की रोशनी में रहनुमाई करे। यही सिलसिला "ख़िलाफ़त" कहलाया।
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🌹 हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ि. (11-13 हिजरी)
सहाबा ने इत्तिफ़ाक़ से हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ि. को पहला ख़लीफ़ा चुना।
आपने नबी ﷺ के बाद उम्मत को एकजुट किया।
"झूठे नबियों" (मुसैलिमा कज़्ज़ाब वग़ैरह) के ख़िलाफ़ जंग की।
ज़कात से इनकार करने वालों से क़ताली लड़ी और इस्लाम की बुनियाद को मज़बूत किया।
आपने कुरआन को एक जगह जमा करने का काम शुरू कराया।
👉 आप ही वो शख़्स थे जिन्हें "सिद्दीक़-ए-अकबर" कहा गया, क्योंकि आपने हर हाल में रसूलुल्लाह ﷺ की तस्दीक़ की।
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🌙 हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ि. (13-23 हिजरी)
आपकी ख़िलाफ़त दस साल चली और इस दौरान इस्लाम दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त बन गया।
आपने इराक़, शाम, मिस्र और ईरान तक फतह की।
अदालतों का निज़ाम, जज़िया, पुलिस, जेल और बैतुल माल जैसी इदारों की बुनियाद रखी।
हिजरी कैलेंडर की शुरुआत भी आपके दौर में हुई।
👉 आपको "फ़ारूक़" कहा गया, यानी हक़ और बातिल में फ़र्क़ करने वाले।
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🌟 हज़रत उस्मान ग़नी रज़ि. (23-35 हिजरी)
आपकी ख़िलाफ़त बारह साल रही।
आपने कुरआन-ए-करीम को एक लिपि (मुसहफ़ उस्मानी) में जमा करवा कर पूरी उम्मत को एक किया।
समुंदर की जिहाद का आग़ाज़ किया और नए-नए मुल्कों को इस्लाम में शामिल किया।
आपके दौर में उम्मत में फ़ितनों की शुरुआत भी हुई, और आख़िर में आप शहीद कर दिए गए।
👉 आपको "ज़ुन-नूरैन" कहा गया, क्योंकि आप नबी ﷺ की दो बेटियों से निकाह में रहे।
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✨ हज़रत अली रज़ि. (35-40 हिजरी)
आप रसूलुल्लाह ﷺ के चचेरे भाई और दामाद थे।
आपकी ख़िलाफ़त में बहुत से फितने उठे (जैसे जंगे जमल और सिफ़्फ़ीन)।
आपने इल्म और इंसाफ़ को ज़िंदा किया और इस्लाम की गहराईयों में इजाफ़ा किया।
आपके दौर में "ख़वारिज़" नाम का एक ग़लत गिरोह उभरा, जिसने आख़िरकार आपको शहीद कर दिया।
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